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एसजीआरआर विश्वविद्यालय में तंबाकू जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

नशा मुक्त समाज के लिए शिक्षक की भूमिका अहम
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एसजीआरआर विश्वविद्यालय में तंबाकू जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन
नशा मुक्त समाज का लिया संकल्प
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देहरादून। श्री गुरु राम राय विश्वविद्यालय में मंगलवार को जिला तम्बाकू नियंत्रण प्रकोष्ठ देहरादून द्वारा संवेदीकरण अभियान के अंतर्गत युवाओं को तंबाकू के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने हेतु एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में वक्ताओं ने तंबाकू के दुष्प्रभावों पर व्यापक चर्चा की।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री महंत देवेंद्र दास जी महाराज ने प्रेषित संदेश में कहा कि आज का युवा देश का भावी भविष्य है, इसलिए इनके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी संपूर्ण समाज की हैं। युवाओं का भविष्य संवारने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए शिक्षक विद्यार्थियों को नशे के दुष्प्रभावों से भी सचेत करते रहें ताकि वे शारिरिक और मानसिक दोनों रूपों से स्वस्थ बन सकें। इसके लिये एक व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यू. एस. रावत ने कहा कि हमें युवा विद्यार्थियों की शक्ति और सामथ्र्य को सही दिशा देनी होगी, इसके लिए जरूरी है कि वे नशे से दूर रहें। तंबाकू मुक्त समाज के लिए पारिवारिक वातावरण काफी महत्वपूर्ण होता है। काॅलेज तक आते-आते यदि कोई छात्र नशे का शिकार हो जाता है तो शिक्षकों के लिए उन्हें सही राह पर लाना बड़ी चुनौती होती है। शिक्षकों को ऐसे छात्रों को सही मार्गदर्शन देना चाहिए। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय परिसर पूरी तरह तंबाकू मुक्त है।
कार्यक्रम की शुरूआत संगीत विभाग के विद्यार्थियों द्वारा सरस्वती वंदना से की गई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय कुलसचिव प्रो. दीपक साहनी ने कहा कि हमें विद्यार्थियों के भविष्य को बेहतर बनाने का संकल्प लेना होगा। नशे के शिकार लोगों को इससे बाहर निकालना बड़ी चुनौती है। इसके लिए ज्ञान, ध्यान और योग को अपनाने की जरूरत है, तभी भावी पीढ़ी को हम नशे से दूर रख सकते हैं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के एसीएमओ डाॅ. दिनेश चैहान ने तम्बाकू से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने कहा कि कोरोना सेे होने वानी मौतों में तंबाकू का सेवन करने वाले लोग अधिक संख्या में थे। उन्होंने बताया कि पर्यटक स्थल मंसूरी को हम तंबाकू मुक्त कर चुके हैं। अब कोशिश है कि तीर्थनगरी ऋषिकेश को तंबाकू मुक्त बनाया जाए।
राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम की जिला सलाहकार अर्चना उनियाल ने बताया कि 1986 में पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ने तंबाकू के खिलाफ आवाज उठाई गई। इसके बाद जाकर भारत में तंबाकू नियंत्रण कानून 2003 अस्तित्व में आया। तंबाकू न केवल पीने वाले को नुकसान पहुँचाता है बल्कि आसपास के लोगों के लिए भी घातक है। इसके बावजूद हम देखते हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान नियमों की अनदेखी की जाती है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में 2007 में तंबाकू नियंत्रण अभियान की शुरूआत की गई। उनका कहना था कि तंबाकू उन्मूलन के संदर्भ में उत्तराखंड की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। इस मौके पर उन्होंने विद्यार्थियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिए।
इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता रेखा उनियाल ने बताया कि विश्व में वर्ष भर में 70 लाख मौतें तंबाकू के सेवन से होती हैं। जबकि भारत में यह आंकड़ा 3500 मृत्यु प्रतिदिन का है। चिंता की बात यह है कि 5500 नए युवा प्रतिदिन तंबाकू का शिकार बन रहे हैं।
कार्यक्रम में मनोचिकित्सक डाॅ. अनुराधा ने भारत और उत्तराखंड में तंबाकू के दुष्प्रभावों पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि तंबाकू उद्योग में अधिकतर कामगार बच्चे ही होते हैं जिससे उनकी सेहत पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। हम सबको मिलकर तंबाकू के विरूद्ध सामूहिक प्रयास करने होंगे तभी हम एक तंबाकू मुक्त स्वस्थ्य समाज की कल्पना कर सकते हैं।
कार्यक्रम में आयोजित पोस्टर प्रतियोगिता में पीएचडी छात्रा शिवानी नौटियाल ने प्रथम, एनसीसी कैडेट साक्षी सजवाण ने द्धितीय व पीएचडी छात्रा अदिति मिश्रा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅं. दीपक सोम ने किया। कार्यक्रम में गणेश डबराल ने तकनीकी सहयोग दिया।
इस मौके पर विश्वविद्यालय के समस्त शिक्षकों और कर्मचारियों ने नशा मुक्त समाज का संकल्प भी लिया। इस दौरान कोरोना प्रोटोकॉल्स का पूरी तरीके से पालन किया गया। कार्यक्रम में प्रो. कुमुद सकलानी, प्रो. मनीषा सिंह, प्रो. अरूण कुमार, प्रो. सरस्वती काला, प्रो. अलका चैधरी, डाॅ. प्रिया पांडे ,डाॅ. अनुजा रोहिला सहित समस्त शिक्षक स्टाॅफ और कर्मचारी मौजूद थे।